लखनऊ में राष्ट्रीय संगोष्ठी: भारतीय ज्ञान परंपरा में पर्यावरण संरक्षण पर विद्वानों ने रखे विचार, साहित्यकारों को मिला सम्मान
राष्ट्रीय पुस्तक मेले के सभागार में 10 अक्टूबर 2026 को माधवी फाउंडेशन, लखनऊ और विश्व साहित्य सेवा ट्रस्ट, आगरा के संयुक्त तत्वावधान में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा में पर्यावरण बोध’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया
लखनऊ। राष्ट्रीय पुस्तक मेले के सभागार में 10 अक्टूबर 2026 को माधवी फाउंडेशन, लखनऊ और विश्व साहित्य सेवा ट्रस्ट, आगरा के संयुक्त तत्वावधान में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा में पर्यावरण बोध’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. योगेश गुप्त ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव उपस्थित रहे। समारोह में साहित्य एवं पर्यावरण क्षेत्र से जुड़े विद्वानों ने भारतीय संस्कृति में प्रकृति संरक्षण के महत्व पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
संगोष्ठी में सारस्वत अतिथि श्री मुकेश कुमार, डॉ. अखिलेश निगम ‘अखिल’ और डॉ. रवीन्द्र प्रभात शामिल हुए। मुख्य वक्ता डॉ. मीनू खरे और डॉ. अलका प्रमोद ने भारतीय ज्ञान परंपरा में नदियों, वनों, वृक्षों और प्रकृति के संरक्षण से जुड़े विचारों को विस्तार से प्रस्तुत किया।
भारतीय संस्कृति में प्रकृति संरक्षण की परंपरा पर चर्चा
माधवी फाउंडेशन की अध्यक्ष डॉ. मिथिलेश दीक्षित और विश्व साहित्य सेवा ट्रस्ट के अध्यक्ष डॉ. मोहन मुरारी शर्मा ने संगोष्ठी के उद्देश्य और आयोजन की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। वक्ताओं ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और चेतना का आधार माना गया है।
मुख्य वक्ता डॉ. मीनू खरे ने भारतीय ज्ञान परंपरा में नदियों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि नदियां केवल जल की धाराएं नहीं, बल्कि जीवन और संस्कृति की जीवंत धारा हैं। ऋग्वेद के नदी सूक्त में गंगा, यमुना, सरस्वती और सिंधु जैसी नदियों का उल्लेख प्रकृति के प्रति सम्मान की प्राचीन परंपरा को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि नदी के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र में अतिक्रमण बाढ़ जैसी समस्याओं को गंभीर बना सकता है। नदी के साथ सह-अस्तित्व स्थापित करना ही पर्यावरण संरक्षण का वास्तविक मार्ग है।
डॉ. अलका प्रमोद ने वैदिक साहित्य में प्रकृति के प्रति श्रद्धा और संरक्षण की भावना पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भारतीय परंपरा में वन, वृक्ष और वनस्पतियों को विशेष महत्व दिया गया है। वेदों में वृक्षों और वनस्पतियों के प्रति सम्मान का उल्लेख प्रकृति के संरक्षण को जीवन के आचरण से जोड़ता है।
पर्यावरण संकट के दौर में भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता
मुख्य अतिथि डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव ने अपने आलेख के माध्यम से विषय पर विस्तार से विचार प्रस्तुत किए। श्री मुकेश कुमार ने कहा कि वेदों और उपनिषदों से लेकर भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं तक पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के प्रति सम्मान का संदेश मिलता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना मनुष्य और प्रकृति के बीच आत्मीय संबंध को व्यक्त करती है।
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के बढ़ते संकट के बीच भारतीय ज्ञान परंपरा पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान कर सकती है। विकास और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करना ही वास्तविक समृद्धि का आधार है।
डॉ. रवीन्द्र प्रभात ने नदियों, पर्वतों, वृक्षों और वनस्पतियों के प्रति भारतीय समाज की श्रद्धा को पर्यावरणीय चेतना का महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने कहा कि गंगा, यमुना और नर्मदा जैसी नदियों को मातृस्वरूप मानने तथा पीपल, बरगद, नीम और तुलसी जैसे पौधों के प्रति सम्मान की परंपरा ने प्रकृति संरक्षण की भावना को मजबूत किया है। प्रकृति की रक्षा करना मानव सभ्यता और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा करना है।
डॉ. योगेश गुप्त ने बताया पर्यावरण-बोध का महत्व
संगोष्ठी के अध्यक्ष डॉ. योगेश गुप्त ने भारतीय सांस्कृतिक संरचना को प्रकृति-सापेक्ष बताते हुए पृथ्वी, नदियों, वृक्षों और सूर्य के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने पर्यावरण-बोध को प्रकृति, जीव-जगत और मानव समाज के पारस्परिक संबंधों की ऐसी समझ बताया, जो मनुष्य के व्यवहार और जीवनशैली को प्रभावित करती है।
विद्वानों को सम्मानित किया गया
कार्यक्रम के दौरान पर्यावरण और साहित्य के क्षेत्र में योगदान देने वाले अनेक विद्वानों को सम्मानित किया गया। सम्मान प्राप्त करने वालों में डॉ. योगेश गुप्त, श्रीमती मंजू सक्सेना, श्री कैलाश बाजपेयी, डॉ. हरिलाल मिलन, डॉ. मीनू खरे, सुश्री निवेदिता, सुश्री वर्षा अग्रवाल, श्रीमती अंजू निगम, श्री विनय श्रीवास्तव, डॉ. हरिश्चन्द्र शाक्य, डॉ. अनिता कपूर, डॉ. रश्मि शील और डॉ. ध्रुव कुमार शामिल रहे। डॉ. हरीतिमा दीक्षित को ‘शिक्षा रत्न सम्मान’ प्रदान किया गया।
पुस्तकों का लोकार्पण भी हुआ
संगोष्ठी के अवसर पर डॉ. मिथिलेश दीक्षित की पुस्तक ‘मेरे साक्षात्कार’ और डॉ. वर्षा अग्रवाल की पुस्तक ‘आचमन’ का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. रश्मि शील ने किया।
संगोष्ठी में प्रस्तुत विचारों ने भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित पर्यावरणीय चेतना, प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित किया। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि पर्यावरण संरक्षण को केवल विचार तक सीमित न रखकर दैनिक जीवन और सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बनाना आवश्यक है।
What's Your Reaction?
Like
2
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)